नेपाल में नई सरकार के लिए 60% वोटिंग, 1.90 करोड़ जनता ने तय की मुल्क की तकदीर
काठमांडू: नेपाल में नई सरकार चुनने के लिए गुरुवार को मतदान हुआ। विभिन्न मतदान केंद्रों पर सुबह से ही वोटर्स का जमावड़ा देखने को मिला। जेन-ज़ी आंदोलन के बाद हुए इस पहले चुनाव में युवाओं के बीच जबरदस्त उत्साह देखने को मिला। गुरुवार देर शाम तक 60 प्रतिशत मतदान हुआ। इस बार करीब एक करोड़ 90 लाख मतदाताओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया, जिसमें युवाओं की बड़ी भागीदारी ने चुनाव को और भी दिलचस्प बना दिया है। नेपाल चुनाव आयोग के मुताबिक, छिटपुट घटनाओं को छोडक़र, देशभर में प्रतिनिधि सभा के सदस्यों के चुनाव के लिए मतदान शांतिपूर्ण और उत्साहपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ। प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली में 65 राजनीतिक दल 61 चुनाव चिन्हों पर चुनाव लड़ रहे हैं।
प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली में 3,406 उम्मीदवार मैदान में हैं, जिनमें 3,017 पुरुष, 388 महिलाएं और एक अन्य उम्मीदवार शामिल हैं। नेपाल की अंतरिम प्रधानमंत्री सुशीला कार्की ने देश में संसदीय चुनाव पर खुशी जाहिर की है और कहा है कि उन्होंने अपने कत्र्तव्य का निर्वहन किया है। श्रीमती कार्की ने वोट डालने के बाद चुनाव के उत्साहपूर्ण संचालन से खुशी जाहिर की। इस दौरान उन्होंने अपने नेतृत्व को लेकर पूछे गए एक सवाल के जवाब में कहा कि मैंने अपनी ड्यूटी पूरी की है। उन्होंने कहा कि यह चुनाव देश का भविष्य तय करने वाला है।
इन तीन बड़ी पार्टियों में मुकाबला
नेपाल की राजनीति में हमेशा बदलाव होते रहते हैं। यहां तीन बड़ी पार्टियां प्रमुख हैं और उनके नेता सत्ता बदलते रहते हैं। पुष्प कमल दहल प्रचंड की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी केंद्र), केपी शर्मा ओली की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूएमएल) और शेर बहादुर देउबा की नेपाली कांग्रेस देश की राजनीति में मुख्य भूमिका निभाती हैं। पिछले साढ़े तीन दशकों में इन पार्टियों ने लगातार गठबंधन बदलते रहे और अपने फायदे के हिसाब से समझौते किए। यही कारण है कि नेपाल में कोई भी प्रधानमंत्री कभी भी पूरे पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया।
2017 में यूएमएल सबसे बड़ी पार्टी बनी थी, जबकि 2022 में नेपाली कांग्रेस ने बढ़त बनाई। जुलाई, 2024 तक यूएमएल और नेपाली कांग्रेस ने मिलकर ओली को प्रधानमंत्री बनाकर गठबंधन सरकार चलाया, लेकिन जेन जेड प्रदर्शनों के बाद यह सरकार भी गिर गई। चुनाव से पहले हर बार चर्चा होती है कि पार्टियां गठबंधन बनाएंगी, लेकिन नतीजे आने के बाद ये अक्सर टूट जाते हैं। इस बार भी जनता यही देख रही है कि चुनाव के बाद राजनीति में क्या बदलाव आएगा।
