हिमाचलः किन्नौर के बर्फीले क्षेत्रों में ‘ट्रेनिंग-प्रूनिंग’ की वैज्ञानिक तकनीकें

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रिकांगपिओ: जनजातीय विकास कोष के अंतर्गत नावार्ड वाड़ी परियोजना प्रबंधन समिति छितकुल, रकछम एवं थेमगारंग में एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजन किया गया। इस दौरान कृषि विज्ञान केंद्र किन्नौर के फल वैज्ञानिक डाक्ट अरुण कुमार ने बागबानों को सेब में ट्रेनिंग एवं प्रूनिंग की उन्नत तकनीकों की जानकारी दी। यह कार्यक्रम केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय एवं सर्वे हिमालय सोसाइटी द्वारा सहयोग किया गया। डाक्टर अरुण नेगी ने बताया कि छितकुल और मस्तरंग क्षेत्र में अधिकांश समय तापमान शून्य से नीचे रहने के कारण किसान सेब की खेती को लेकर संकोच में रहते हैं। वर्ष 2010 में कुछ किसानों ने लगभग 3400 मीटर की ऊंचाई पर मस्तरंग में सीमित स्तर पर सेब के पौधे लगाए, लेकिन वैज्ञानिक जानकारी के अभाव में सही लेआउट, दिशा, दूरी, प्रशिक्षण प्रणाली और कैनोपी प्रबंधन लागू न हो पाने से बागीचे सही आकार नहीं ले पाए।

परिणामस्वरूप पौधों में कैंकर जैसी समस्याएं, कमजोर वृक्ष संरचना, कम उत्पादन और घटिया गुणवत्ता के फल देखने को मिले। डाक्टर अरुण कुमार ने रोपण के समय से लेकर परिपक्व वृक्षों तक उचित प्रशिक्षण प्रणाली, स्पर मैनेजमेंट, प्रूनिंग के चरण, शारीरिक एवं वैज्ञानिक आधार तथा ठंडे-बर्फीले क्षेत्रों में पौधों की संभाल पर प्रायोगिक जानकारी दी। किसानों ने बताया कि उन्हें पहली बार इस प्रकार की वैज्ञानिक और व्यवहारिक जानकारी मिली, जिससे उन्हें विश्वास हुआ कि सही तकनीकों के प्रयोग से बेहतर उत्पादन कर सकेंगे।

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