हरिद्वार-नजीबाबाद NH बना ‘धूल का गुबार’: वर्षों से लंबित निर्माण से जोखिम बढ़ा

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देहरादून: गढ़वाल-कुमाऊं व उत्तर प्रदेश में प्रवेश करने की महत्वपूर्ण कड़ी हरिद्वार-नजीबाबाद राष्ट्रीय राजमार्ग में इन दिनों धूल ही धूल है।

फ्लाईओवर व सड़क निर्माण से इस अति व्यस्तम मार्ग के एक। हिस्से में वाहन चलाना जान को जोखिम में डालने के समान हो गया है।

वीडियो में साफ दिख रहा है कि दोपहिया वाहन सवार महिला को ड्राइव करने में आ रही परेशानी की वजह से किनारे पर रुकना पड़ा।

अस्त व्यस्त इस राष्ट्रीय राजमार्ग में जारी निर्माण कार्यों से उठ रही धूल से बीमारी का खतरा भी बढ़ गया है। उस राष्ट्रीय राजमार्ग में एक दिन में हजारों वाहन गुजरते हैं।

चारधाम व कांवड़ यात्रा के दौरान इस राष्ट्रीय राजमार्ग पर वाहनों और श्रद्धालुओं का जनसमुद्र उमड़ पड़ता है।

गौरतलब है कि बीते कुछ साल से हरिद्वार- नजीबाबाद NH पर वन्य जंतुओं की सुरक्षा के लिए फ्लाई ओवर का निर्माण भी किया जा रहा है। लेकिन तय सीमा के बाद भी यह निर्माण कार्य पूरा नही हुआ है। लम्बे समय तक इस रूट पर निर्माण कार्य बंद भी रहा।

नतीजतन, कई साल से जारी निर्माण कार्य से उठ रही जानलेवा धूल मजदूरों के साथ जनता के लिए भी बीमारी का कारक बनती जा रही है।

राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के जिम्मेदार अधिकारी इस इलाके में पानी के छिड़काव की ठोस व्यवस्था नहीं कर पा रहे हैं।

निर्माण कार्य में लगातार देरी व बंदी की वजह पर केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी भी अफसोस जाहिर कर चुके हैं।

एनएचएआई द्वारा धूल नियंत्रण के उपाय

सरकार ने संसद में बताया है कि भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) निर्माण स्थलों पर धूल को नियंत्रित करने के लिए कदम उठा रहा है। इसमें धूल को कम करने के लिए पानी के छिड़काव जैसे उपाय शामिल हैं।
केवल पानी का छिड़काव पर्याप्त नहीं: यह भी सामने आया है कि केवल पानी के छिड़काव से धूल प्रदूषण का पूरी तरह समाधान नहीं होगा, बल्कि नियमों का प्रभावी ढंग से पालन करना आवश्यक है।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और संबंधित प्राधिकरणों के दिशानिर्देशों का सार इस प्रकार है:
प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को अधिकार: अगस्त 2025 में, सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पी.सी.बी.) पर्यावरण को हुए नुकसान की भरपाई के लिए मुआवजा और हर्जाना वसूल कर सकते हैं। यह निर्णय यह सुनिश्चित करता है कि पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाली निर्माण गतिविधियों पर भी कार्रवाई हो सकती है।

हवा में सांस लेने का मौलिक अधिकार:

न्यायालय ने यह भी दोहराया है कि प्रदूषण मुक्त वातावरण में रहना प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है, जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का एक हिस्सा है।

एन.सी.आर. में निर्माण पर सख्ती

दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते वायु प्रदूषण के मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के राज्यों को ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (जीआरएपी-4) के उपायों को सख्ती से लागू करने का निर्देश दिया है। इसके तहत प्रदूषण नियंत्रण के लिए टीमों का गठन करने के आदेश दिए गए हैं, जो निर्माण स्थलों पर नियमों के पालन की निगरानी करती हैं।

डक्ट निर्माण का विचार: 2021 में, एक याचिका पर सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने सड़क निर्माण के दौरान अनिवार्य रूप से डक्ट बनाने के विचार को ‘बेहतर’ बताया। इसका उद्देश्य भविष्य में बार-बार सड़क खोदने से होने वाले धूल प्रदूषण को रोकना है। याचिकाकर्ता ने राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) के 2016 के दिशानिर्देशों का पालन न होने का मुद्दा उठाया था।

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