धर्म: जानिए भगवान कार्तिकेय ने मोर को क्यों बनाया अपना वाहन

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धर्म: भगवान कार्तिकेय, जिन्हें स्कंद, मुरुगन, सुब्रमण्यम और षडानन के नाम से भी जाना जाता है, भगवान शिव और माता पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र और देवताओं के सेनापति हैं. उनका वाहन मोर है, और इसके पीछे कई पौराणिक कथाएं और गहन प्रतीकात्मक अर्थ छिपे हुए हैं. मोर को भगवान कार्तिकेय का वाहन बनाए जाने के संबंध में कई रोचक कथाएं प्रचलित हैं| पौराणिक कथाओं के अनुसार, ताड़कासुर नामक एक अत्यंत शक्तिशाली असुर था, जिसे ब्रह्मा से यह वरदान मिला था कि उसका वध केवल भगवान शिव के पुत्र द्वारा ही हो सकता है. देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र कार्तिकेय का जन्म हुआ|

पौराणिक कथाओं के अनुसार, ताड़कासुर नामक एक अत्यंत शक्तिशाली असुर था, जिसे ब्रह्मा से यह वरदान मिला था कि उसका वध केवल भगवान शिव के पुत्र द्वारा ही हो सकता है. देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र कार्तिकेय का जन्म हुआ| जब भगवान कार्तिकेय ने असुरों के साथ युद्ध किया, तो उन्हें एक क्रूर और अहंकारी राक्षस क्रौंच का सामना करना पड़ा. क्रौंच अपनी मायावी शक्तियों के कारण एक विशाल पर्वत का रूप धारण कर लेता था और देवताओं को परेशान करता था. भगवान कार्तिकेय ने अपनी दिव्य शक्ति ‘शक्तिवेल’ (भाला) से क्रौंच पर्वत पर प्रहार किया. इस प्रहार से क्रौंच पर्वत दो भागों में विभाजित हो गया.

जब भगवान कार्तिकेय ने असुरों के साथ युद्ध किया, तो उन्हें एक क्रूर और अहंकारी राक्षस क्रौंच का सामना करना पड़ा. क्रौंच अपनी मायावी शक्तियों के कारण एक विशाल पर्वत का रूप धारण कर लेता था और देवताओं को परेशान करता था. भगवान कार्तिकेय ने अपनी दिव्य शक्ति ‘शक्तिवेल’ (भाला) से क्रौंच पर्वत पर प्रहार किया. इस प्रहार से क्रौंच पर्वत दो भागों में विभाजित हो गया| क्रौंच राक्षस, जिसने पर्वत का रूप धारण किया था, अपने अहंकार के कारण नष्ट नहीं हो पाया

पने ज्ञान और दयालुता से क्रौंच के एक भाग को मोर में और दूसरे भाग को मुर्गे में परिवर्तित कर दिया था. कार्तिकेय ने उस मोर से कहा कि अब से तुम मेरे वाहन बनोगे. इस प्रकार, मोर ने अपना अहंकार त्यागा और भगवान का वाहन बनकर उनकी सेवा की. मुर्गा उनकी ध्वजा पर स्थापित हुआ, जो सुबह उठकर लोगों को कर्म करने का संदेश देता है| क्रौंच राक्षस, जिसने पर्वत का रूप धारण किया था, अपने अहंकार के कारण नष्ट नहीं हो पाया था. भगवान कार्तिकेय ने अपने ज्ञान और दयालुता से क्रौंच के एक भाग को मोर में और दूसरे भाग को मुर्गे में परिवर्तित कर दिया था. कार्तिकेय ने उस मोर से कहा कि अब से तुम मेरे वाहन बनोगे. इस प्रकार, मोर ने अपना अहंकार त्यागा और भगवान का वाहन बनकर उनकी सेवा की. मुर्गा उनकी ध्वजा पर स्थापित हुआ, जो सुबह उठकर लोगों को कर्म करने का संदेश देता है|

यह कथा दर्शाती है कि भगवान कार्तिकेय ने अहंकार (क्रौंच राक्षस के रूप में) को समाप्त करके उसे अपने नियंत्रण में लिया था. मोर अपनी सुंदरता और चंचलता के लिए जाना जाता है. इसे अपने वाहन के रूप में स्वीकार करके कार्तिकेय ने यह संदेश दिया कि वे मन की चंचलता और अहंकार को भी नियंत्रित कर सकते हैं. यह कथा दर्शाती है कि भगवान कार्तिकेय ने अहंकार (क्रौंच राक्षस के रूप में) को समाप्त करके उसे अपने नियंत्रण में लिया था. मोर अपनी सुंदरता और चंचलता के लिए जाना जाता है. इसे अपने वाहन के रूप में स्वीकार करके कार्तिकेय ने यह संदेश दिया कि वे मन की चंचलता और अहंकार को भी नियंत्रित कर सकते हैं| कुछ मान्यताओं के अनुसार, देवताओं के राजा इंद्र ने भगवान कार्तिकेय को उनके बल और पराक्रम से प्रसन्न होकर एक अद्भुत मोर भेंट किया था. इसी मोर पर सवार होकर कार्तिकेय ने कई युद्ध लड़े और देवताओं को विजय दिलाई. इस प्रकार वह मोर कार्तिकेय का स्थायी वाहन बन गया. मोर अपनी सुंदरता और रंगीन पंखों के लिए प्रसिद्ध है. मोर का वाहन होना यह दर्शाता है कि कार्तिकेय ज्ञान और नियंत्रण के प्रतीक हैं, जो अपनी इंद्रियों और मन की चंचलता को वश में रखते हुए सभी प्रकार की नकारात्मक शक्तियों का नाश कर सकते हैं. मोर के पैरों का न होना या छोटे होना, और उसके नाचने के पीछे की पवित्रता भी उसके दैवीय गुणों को दर्शाती है| कुछ मान्यताओं के अनुसार, देवताओं के राजा इंद्र ने भगवान कार्तिकेय को उनके बल और पराक्रम से प्रसन्न होकर एक अद्भुत मोर भेंट किया था. इसी मोर पर सवार होकर कार्तिकेय ने कई युद्ध लड़े और देवताओं को विजय दिलाई. इस प्रकार वह मोर कार्तिकेय का स्थायी वाहन बन गया. मोर अपनी सुंदरता और रंगीन पंखों के लिए प्रसिद्ध है. मोर का वाहन होना यह दर्शाता है कि कार्तिकेय ज्ञान और नियंत्रण के प्रतीक हैं, जो अपनी इंद्रियों और मन की चंचलता को वश में रखते हुए सभी प्रकार की नकारात्मक शक्तियों का नाश कर सकते हैं. मोर के पैरों का न होना या छोटे होना, और उसके नाचने के पीछे की पवित्रता भी उसके दैवीय गुणों को दर्शाती है|

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