सुप्रीम कोर्ट ने आसाराम को अंतरिम जमानत देने से किया इनकार
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2013 में नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे स्वयंभू बाबा आसाराम को स्वास्थ्य आधार पर अंतरिम जमानत देने से गुरुवार को इनकार कर दिया। हालांकि, अदालत ने उसे 24 घंटे सहायता के लिए अपनी पसंद का प्रशिक्षित केयरटेकर रखने की अनुमति प्रदान की।
जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस पी.बी. वराले की पीठ ने आसाराम की अंतरिम जमानत याचिका पर अंतिम निर्णय फिलहाल लंबित रखते हुए कहा कि यदि उसकी स्वास्थ्य स्थिति अचानक बिगड़ती है तो मामले का तत्काल उल्लेख किया जा सकता है।
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि आसाराम ने यह तथ्य छिपाया कि उसके वकील पहले ही पैरोल के लिए आवेदन कर चुके हैं। इस पर बचाव पक्ष ने दलील दी कि पैरोल की अर्जी काफी पहले दी गई थी, लेकिन स्वास्थ्य कारणों के बावजूद उसे मंजूरी नहीं मिली।
सुप्रीम कोर्ट ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) की मेडिकल रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि रिपोर्ट के अनुसार आसाराम को अस्पताल में भर्ती करने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन उसे चौबीसों घंटे चिकित्सकीय सहायता और देखभाल की जरूरत है। इसी आधार पर अदालत ने प्रशिक्षित केयरटेकर रखने की अनुमति दी, जबकि अंतरिम जमानत देने से इनकार कर दिया।
इससे पहले 21 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने एम्स निदेशक को आसाराम की स्वास्थ्य स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए मेडिकल बोर्ड गठित करने का निर्देश दिया था। मेडिकल बोर्ड से एक सप्ताह के भीतर रिपोर्ट मांगी गई थी, जिसके आधार पर गुरुवार को सुनवाई हुई।
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने यह भी कहा कि कुछ महीने पहले आसाराम काशी विश्वनाथ और अयोध्या की यात्रा कर चुका है। उन्होंने अदालत को बताया कि पहले उसे जिस आधार पर राहत मिली थी, उसमें उसकी गंभीर स्वास्थ्य स्थिति का उल्लेख किया गया था, जबकि अब वह यात्रा करने में सक्षम दिखाई देता है।
वहीं, आसाराम के वकील ने अदालत से अनुरोध किया कि मामले को एम्स निदेशक के समक्ष भेजा जाए ताकि विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम विस्तृत जांच कर यह तय कर सके कि उसे अस्पताल में भर्ती करने की आवश्यकता है या नहीं।
उल्लेखनीय है कि 27 मई को राजस्थान हाईकोर्ट ने 2013 के नाबालिग दुष्कर्म मामले में आसाराम की दोषसिद्धि और ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा था। हालांकि, अदालत ने तत्कालीन भारतीय दंड संहिता और पॉक्सो अधिनियम के कुछ अन्य आरोपों से उसे बरी कर दिया था, जबकि नाबालिग से दुष्कर्म से संबंधित आईपीसी की धारा 376(2)(एफ) के तहत उसकी दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा यथावत रखी गई।
