कुमांऊ के वैवाहिक परिधान ‘रंग्याली पिछोड़ी’ को मंजू ने दी वैश्विक स्तर पर पहचान

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-रिवर्स पलायन को मंजू बोली चलो जड़ें बुलाती हैं

उत्तराखंड में आए दिन बाहरी राज्यों के रस्मों रिवाजों का प्रचलन देखने को मिलता रहता है लोग शादी में पंजाब का चूड़ा के साथ फुलकारी, राजस्थान की घाघरा चोली और न जाने कहां कहां के परिधान पहने हुए दिखते हैं जबकि हम खुद एक ऐसे राज्य से ताल्लुक रखते है जिसके परिधानों की सुंदरता और संपन्नता के राज यहां के इतिहास में छुपे हुए है तो क्यों न हम आज अपने परिधानों को एक अलग सी पहचान बनाने की कवायद शुरू कर दें जिससे हमें एक अलग सी पहचान मिल सके:  मंजू 

           .रंग्याली पिछोड़ी, गर्ल मंजू टम्टा

देहरादून:  पहाड़ की समृद्धि यहां आभूषणों के परिधानों में सदियों पुरानी रही है और समय समय पर इनमें बदलाव भी हुए, क्योंकि कहा जाता है कि परिवर्तन प्रकृति का नियम और जरूरत आविष्कार की जननी है और भारतीय संस्कृति में  यदि हम बात करते है अपनी पहाड़ी रीति रिवाज और संस्कृति की ये बहुत ही अदभुत और अनूठी परम्परा के ताने बाने से मिलकर बनी है और उस ताने बाने को आज भी हम कायम किए हुए हैं। यहां के हर वर्ग हर जाति की एक ही संस्कृति देखने को मिलती है।

उत्तराखंड का कुमाऊं मंडल धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं की आस्था का केंद्र है। उन परम्पराओं में हम देखते है तो पाते है कि कुछ परिधान ऐसे है जो हमारी धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यता के द्योतक होते है। उनको आम जन जीवन में कब और कैसे धारण करना है, उनके कुछ कायदे कानून है जिन्हें हम सदियों से और आज तक के परिवेश में नियम पूर्वक संजोए हुए है ऐसा ही एक परिधान है रंग्याली पिछोड़ी।

संस्कृति और सभ्यता एक दूसरे के पूरक होते है पर आज विडम्बना ये है कि पहाड़ के पहाड़ सूने होते जा रहे है और जब यहां की सभ्यता ही नहीं बचेगी तो संस्कृति का क्या? आज हम दौड़ भाग वाली जीवन शैली की वजह से महानगरों को तरफ रुख करने को आतुर रहते है और वहीं की जीवनशैली में लिप्त होते जा रहे है पर कुछ लोग ऐसे है जो प्रवास में रहकर भी अपनी जड़ों से मजबूती से जकड़े  रहे और समय व मौका मिलने पर वापस अपनी मूल जड़ में आने का फैसला लिया, क्योंकि उनका कहना है कि ‘जड़ें बुलाती है।’ ऐसी ही एक शख्सियत है लोहाघाट पिथौरागढ़ की एक बेटी मंजू टम्टा जो आज एक ब्रांड बन चुकी है। उनका कहना है कि वो दिल्ली जैसे महानगर में पैदा तो हुई पर मां बाप ने पूरी तरह से पहाड़ी परिवेश में उनकी परवरिश की, जिसकी वजह से उन्हें पहाड़ की संस्कृति के बारे में बचपन से ही पता था।

वो कहती है कि हर साल गर्मी के मौसम में पड़ने वाली छुट्टियों का उन्हें बेसब्री से इंतजार रहता था। उनको पहाड़ी संस्कृति बचपन से ही लुभाती थी। उत्तराखंड में आए दिन बाहरी राज्यों के रस्मों रिवाजों का प्रचलन देखने को मिलता रहता है लोग शादी में पंजाब का चूड़ा के साथ फुलकारी, राजस्थान की घाघरा चोली और न जाने कहां कहां के परिधान पहने हुए दिखते हैं जबकि हम खुद एक ऐसे राज्य से ताल्लुक रखते है जिसके परिधानों की सुंदरता और संपन्नता के राज यहां के इतिहास में छुपे हुए है तो क्यों न हम आज अपने परिधानों को एक अलग सी पहचान बनाने की कवायद शुरू कर दें जिससे हमें एक अलग सी पहचान मिल सके।

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